नई दिल्ली, 1 दिसंबर 2025 — घरेलू और वैश्विक आर्थिक दबावों के बीच Indian Rupee (INR) ने फिर एक नया रिकॉर्ड बनाया है। सोमवार को अमेरिकी Dollar के मुकाबले रुपये ने ₹89.76 प्रति Dollar का नए ऐतिहासिक निचला स्तर छुआ।
इस गिरावट के कई कारण सामने आ रहे हैं — जिनमें विदेशी निवेशकों की भारी निकासी, अमेरिका-भारत व्यापार समझौते में देरी, बढ़ती आयात लागत और मुद्रा बाज़ार में अस्थिरता शामिल हैं।
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Toggleगिरावट क्यों हुई — मुख्य कारण
इस साल अब तक विदेशी फंड्स ने भारत से 16 बिलियन डॉलर से ज़्यादा निकाला है। इस निकासी से डॉलर की मांग बढ़ी और रुपये पर दबाव बढ़ा।
अमेरिका-भारत के बीच व्यापार समझौते (Trade Deal) में ठहराव के चलते निवेशकों का विश्वास कम हुआ। इससे रुपये को मजबूती नहीं मिल पाई।
भारत का निरंतर बढ़ता व्यापार घाटा (Trade Deficit) और बढ़ती आयात ज़रूरतों ने भी डॉलर की ओर पूर्वगामी दबाव बनाया।
मुद्रा बाज़ार में Non-Deliverable Forwards (NDF) जैसे जटिल उपकरणों की अवधि समाप्त होने, और आयातकों द्वारा डॉलर हेजिंग (Dollar hedging) जैसी गतिविधियों ने रुपये की गिरावट में योगदान दिया।
विशेष बात यह है कि यह गिरावट उस समय हुई है जब देश की आर्थिक वृद्धि — GDP — अपने ऊँचे स्तर पर थी। त्रैमासिक आर्थिक आंकड़ों के अनुसार भारत ने साल-दर-साल 8.2% की वृद्धि दर्ज की।
डॉलर मज़बूत क्यों हो रहा है और भारतीय रुपया कमजोर क्यों?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय रुपया केवल घरेलू कारणों से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक माहौल की वजह से भी लगातार दबाव में है। अमेरिका में ब्याज दरें ऊँची होने के कारण विदेशी निवेशक अपने पैसे भारत जैसे उभरते बाजारों से निकालकर अमेरिका की ओर मोड़ रहे हैं। इससे डॉलर मजबूत और रुपया कमजोर होता जा रहा है। इसके अलावा, मध्य पूर्व में युद्ध, चीन की आर्थिक मंदी, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और वैश्विक अनिश्चितता ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यदि हालात में सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले महीनों में रुपया ₹90 से ₹92 प्रति डॉलर तक भी फिसल सकता है।
क्या इससे आम लोगों और बाजार को नुकसान होगा?
हाँ — प्रभावित होंगे कई सेक्टर:
- आयात-निर्भर उद्योग (जैसे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कच्चा माल) महंगे हो जाएंगे। इससे उत्पादों की कीमतें बढ़ सकती हैं।
- उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों (Consumer Goods) में वृद्धि होगी — जिससे महंगाई दबाव बढ़ेगा।
- विदेश यात्रा, विदेश शिक्षा व दौलत का आयात/निर्यात करने वालों को डॉलर के महंगे होने का सीधा असर झेलना पड़ेगा।
- शेयर बाज़ार में अस्थिरता बढ सकती है. कमजोर रुपया निवेशकों की धारणा पर असर डाल सकता है।
वहीं, निर्यात-उन्मुख उद्योगों जैसे टेक्सटाइल्स, फार्मा, रत्न-गहनों (jewellery), कृषि उत्पाद आदि को थोड़ी राहत मिल सकती है, क्योंकि डॉलर में उनकी कमाई बढ़ जाती है।
आगे की राह कैसी हो सकती है?
विश्लेषकों का कहना है कि यदि विदेशी निवेश संवेदनशीलता, आयात-निर्यात संतुलन, और भारत-यूएस ट्रेड डील में सुधार नहीं हुआ, तो रुपया अभी और नीचे जा सकता है। लेकिन
अगर ग्लोबल पूंजी प्रवाह (Capital Flows) में सुधार हुआ
या आरबीआई (RBI) ने डॉलर बेचकर रुपये को बचाया
या मुद्रा बाज़ार में फिर से स्थिरता आई
तो रुपये में सुधार की गुंजाइश बनी है।
निष्कर्ष
रुपया की तेज और रिकॉर्ड गिरावट सिर्फ एक आर्थिक संकेत नहीं — यह हर आम व्यक्ति और देश की आर्थिक नींव पर असर डालने वाला बड़ा विकास है।
इम्पोर्ट-निर्भर कारोबार, महंगाई, निवेशक भरोसा, विदेश यात्रा, शिक्षा— सब पर इसका असर दिखेगा।
यदि सरकार और केंद्रीय बैंक (RBI) ने समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाये, तो यह गिरावट लोगों की जेब और देश की आर्थिक स्थिरता दोनों को प्रभावित कर सकती है।
लेकिन अगर निर्यातक उद्योग, मुद्रा बाज़ार और निवेशक भरोसे में सुधार हुआ — तो रुपये को फिर से मजबूती मिल सकती है।
यह दौर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तय करेगा कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी मजबूती बनाए रखेगा या नहीं।
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