जापानी स्कूल के छात्र कक्षाएँ साफ करते हुए और दोस्तों के साथ हँसते-मुस्कुराते — जापान की शिक्षा प्रणाली में जीवन कौशलसीख सिर्फ किताबों में नहीं — जापान में बच्चे स्कूल खुद साफ करते हैं

तू चलने दे… अभी दौड़ना बाकी है क्या आपने कभी सोचा है कि वह बच्चा जो A+ लाता है, वही सबसे प्रतिभाशाली हो — यह ज़रूरी है?
क्या स्कूल सिर्फ अंकों की फैक्ट्री हो गया है?
भारत में ये बहस सालों से होती रही है, पर जापान ने इसे पहले ही समझकर एक अद्भुत समाधान निकाल लिया है:

जापान में क्लास 4 (Grade 4) तक कोई Written Exams नहीं होते।
बच्चे मार्कशीट से नहीं, मूल्यांकन (Values) से पहचाने जाते हैं।

यह सुनते ही कई भारतीय माता-पिता का पहला सवाल यही होता है —
“अच्छा… तो बच्चे पढ़ते क्या हैं?”

यही है इस मॉडल की खूबसूरती —
यह पढ़ाई नहीं कम करता, Learning को Meaningful बनाता है।

जापान का मानना है:

Life Skills बुद्धि से पहले सिखाई जानी चाहिए।
Character पहले बने, तब Knowledge टिकती है।

इसीलिए पहली तीन कक्षाओं में इन पर ध्यान दिया जाता है:

प्राथमिक फ़ोकसउद्देश्य
मानव मूल्य (Moral Education)सच बोलना, सहानुभूति, टीमवर्क
स्वच्छता और आत्मनिर्भरताखुद सफाई, अपनी चीजें सम्भालना
शारीरिक विकासDaily Sports, Group Games
सम्मान और अनुशासनTeacher, School, Nature का आदर
मित्रता और टीम भावनासामाजिक बुद्धि (Social IQ)

किताबें सिर्फ दिमाग खोलती हैं
पर व्यवहार इंसान बनाता है

जापानी क्लासरूम में क्या होता है? (जो भारत में शायद ही देखा जाता है)

 जापान की किताबों में नहीं, कक्षा में मूल्य जिए जाते हैं:

बच्चे स्कूल की सफाई खुद करते हैं (ऑकाज़ी)
• दोस्त गलत करे, तो दंड नहीं — मिलकर सुधार करते हैं
गेम्स और म्यूज़िक रोज़ाना अनिवार्य
• शिक्षक से पहले लाइन और ग्रीटिंग सीखते हैं
• भोजन साथ में, कतार में — समानता के साथ

Teacher कहते हैं:

“हमारे छात्र Marks से पहले… एक-दूसरे को पढ़ते हैं।”

तो क्या पढ़ाई नहीं होती?

ज़रूर होती है।पर बिना दबाव। और सही उम्र पर, जब दिमाग तैयार हो जाता है। Grade 4 से Written Exams शुरू होते हैं, लेकिन Focus अब भी रटने पर नहीं, समझने और पूछने पर होता है। वहाँ बच्चे सिर्फ याद नहीं करते — सोचते हैं, सवाल पूछते हैं और चर्चा करते हैं।

भारत बनाम जापान: दो सोच, दो परिणाम

भारतीय कॉलेज छात्र बाहरी सीढ़ियों पर पढ़ते हुए और जापानी स्कूल कक्षा में शांतिपूर्वक पढ़ाई करते हुए दृश्य — India vs Japan Education System. Exam
भारत में अंकों की होड़, जापान में समझ और अनुशासन की शिक्षा

 

पहलूभारत की स्थितिजापान की सोच
मूल्यांकनरैंकिंग और प्रतियोगिताविकास और व्यवहार
दबावअत्यधिक दबाव, माता-पिता और बच्चा दोनों तनाव मेंकम दबाव, धीरे-धीरे सीखने की प्रक्रिया
सीखने का तरीकायाद करना ही सफलतासमझना, करना और अनुभव से सीखना
शिक्षक की भूमिकाकेवल पढ़ाना और अंक लानाचरित्र निर्माण और जीवन कौशल
मानसिक स्वास्थ्यपरीक्षा भय आम बातआत्मविश्वास और खुशी प्राथमिक लक्ष्य

भारत में अक्सर बच्चों को सबसे पहले तनाव से परिचय कराया जाता है, जबकि जापान में सबसे पहले उन्हें मुस्कुराने और सीखने में आनंद लेना सिखाया जाता है।

माता-पिता की सोच का फर्क

भारत में सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला सवाल है: “मेरा बच्चा टॉपर क्यों नहीं?”

जापान में सबसे ज़रूरी सवाल होता है: “मेरा बच्चा अच्छा इंसान है या नहीं?”

यही सोच तय करती है कि स्कूल बच्चों पर दबाव डालेंगे या बच्चों का व्यक्तित्व निखारेंगे। और यही अंतर इन दोनों शिक्षा प्रणालियों की दिशा बदल देता है।

जापान यह मॉडल क्यों चला पाता है?

क्योंकि उनकी शिक्षा-नीति की नींव तीन मजबूत विश्वासों पर टिकी है:

  1. हर बच्चा अलग है — इसलिए तुलना बेकार है।
  2. शिक्षा केवल नौकरी का रास्ता नहीं, समाज निर्माण की प्रक्रिया है।
  3. खुशनुमा बचपन ही मजबूत भविष्य का आधार है।

एक जापानी शिक्षक की बात इस सोच को बिल्कुल साफ कर देती है:

“अगर हम बच्चे को बचपन में ही तोड़ देंगे, तो वह बड़ा होकर दुनिया कैसे बनाएगा?”

मानसिक स्वास्थ्य: परीक्षा से पहले ही टूटते बच्चे

भारत में दुर्भाग्य यह है कि पढ़ाई शुरू होते ही डर भी साथ पढ़ाया जाता है। कई राष्ट्रीय रिपोर्ट्स यह संकेत देती हैं कि–

क्लास 3–4 में ही चिंता (Anxiety) की शुरुआत
स्कूल जाने के डर में लगातार वृद्धि
रचनात्मकता (Creativity) में गिरावट

जड़ एक ही है — अंकों की ऐसी दौड़ जिसमें बच्चा प्रतिभा नहीं, प्रोजेक्ट बन जाता है।

माता-पिता की तुलना, स्कूल की अपेक्षाएँ, और समाज का दबाव… सब मिलकर एक छोटे से कंधे पर बड़ा बोझ डाल देते हैं। इस उम्र में जहाँ बच्चों को तितलियाँ गिननी चाहिए, वहाँ वे नंबर गिन रहे हैं

क्या विज्ञान भी जापान के मॉडल से सहमत है?

जापानी प्राथमिक स्कूल के बच्चे यूनिफॉर्म में समूह में स्कूल जाते हुए — जापान की नो-एक्ज़ाम पॉलिसी का उदाहरण
बच्चा पहले इंसान — जापान में शिक्षा की पहली सीख

बिल्कुल हाँ। बाल मनोविज्ञान का स्पष्ट मत है कि सीखने की प्रक्रिया उम्र के अनुसार बदलती है।

6 से 9 वर्ष की उम्र में बच्चे अवधारणाएँ अपने आसपास देखकर और करके सीखते हैं।
9 से 10 वर्ष के बाद मस्तिष्क में वह क्षमता आती है कि वे अमूर्त (Abstract) और जटिल विषयों को समझ सकें।

इसका सीधा अर्थ यह है:

→ बहुत जल्दी परीक्षा और रटंत-शिक्षा शुरू कर देना बच्चे की सीखने की स्वाभाविक क्षमता को अवरुद्ध कर देता है।

→ सही उम्र आने पर मूल्यांकन शुरू करना दिमाग के विकास के साथ तालमेल बनाता है।

जापान बच्चों को उनकी प्राकृतिक गति से बढ़ने देता है। जबकि कई देशों में, जिनमें भारत भी शामिल है, फूल बनने से पहले ही कलियों पर बोझ डाल दिया जाता है

भारत क्या बदल सकता है? और क्यों यह समय की मांग है

भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि यही बच्चे सबसे अधिक तनाव और दबाव झेल रहे हैं।
अगर भारत जापान के मॉडल से प्रेरणा ले, तो परिणाम गहरे और सकारात्मक हो सकते हैं।

• स्कूल में शुरुआती वर्षों में तनाव कम होगा
• बच्चे प्रश्न पूछने की हिम्मत के साथ बड़े होंगे
• सीखने की प्रक्रिया बोझ नहीं, आनंद बनेगी
• शिक्षक और छात्र के बीच विश्वास बढ़ेगा
• परीक्षा जीवन का लक्ष्य नहीं, केवल एक मानक बनकर रह जाएगी

भारत में बच्चों के बीच बढ़ती बेचैनी और चिंता यह साबित करती है कि बदलाव केवल जरूरी नहीं, अनिवार्य है।


भारतीय शिक्षा विशेषज्ञ क्या कहते हैं

कई विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय बच्चे नंबर तो अच्छे लाते हैं, पर यह चमक अक्सर उनकी आंखों का सुकून छीन लेती है।

एक शिक्षा मनोवैज्ञानिक के शब्दों में:

“अगर बचपन में डर बोया जाएगा,
तो बड़े होकर वही डर निर्णय लेगा।”

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) भी यही बात दोहराती है —
सीखना याद करने से ज्यादा जरूरी है, और तालियों से ज्यादा जरूरी है समझ।

नीति में पहले ही लिखा गया है:

• रटंत शिक्षा की दौड़ कम करना
• बच्चे की प्रकृति और कई प्रकार की बुद्धि को पहचानना
• छोटे बच्चों की पढ़ाई को सरल और बिना तुलना वाला बनाना
• परीक्षा को बोझ नहीं, सीख का हिस्सा बनाना

समस्या केवल इतनी है कि यह बदलाव कागज़ में लिखा हुआ है,
कक्षा में पूरी तरह दिखाई नहीं देता।

निष्कर्ष — रैंकिंग बाद में… Character अभी

हम वह देश हैं जो अंतरिक्ष में इतिहास लिख चुका है, तो यह भी कर सकते हैं कि अपने बच्चों का बचपन बिना बोझ के लिखें

जापान ने साबित कर दिया है —

“भविष्य मार्कशीट से नहीं, सीखने की इच्छा से बनता है।”

अगर भारत इस दिशा में कदम बढ़ाए, तो स्कूल डर का मैदान नहीं, सपनों का मैदान बनेंगे। क्लासरूम नंबरों की प्रतियोगिता नहीं, रिश्तों और सीख का उत्सव बनेंगे। और तब हमारा समाज बच्चों से यह नहीं कहेगा —
“बचपन छोटा कर लो… क्योंकि रिपोर्ट कार्ड बड़ा चाहिए।”
बल्कि कहेगा —
“सीखो, हंसो, बढ़ो… अंक आएँगे, पर तुम पहले इंसान बनो।”

By Divyay

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