social media

आज की युवा पीढ़ी यानी Gen Z को दुनिया की सबसे ज़्यादा डिजिटल रूप से जुड़ी पीढ़ी माना जाता है। Social media जैसे की Instagram, Snapchat, YouTube और Reels अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहे, बल्कि जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। हर पल अपडेट रहना, हर भावना को पोस्ट करना और हर प्रतिक्रिया का इंतज़ार करना आज की दिनचर्या बन गया है।

लेकिन एक गंभीर सवाल अब उभरकर सामने आ रहा है — क्या सोशल मीडिया (social media) हमें जोड़ रहा है या भीतर से और अधिक अकेला (Lonely) बना रहा है?

हाल ही में सामने आए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय Studies बताते हैं कि जो युवा दिन में तीन से चार घंटे से अधिक social media का उपयोग करते हैं, उनमें अकेलेपन (Loneliness), चिंता (Anxiety) और आत्मविश्वास की कमी (Low Self-Esteem) की समस्या अधिक देखी जा रही है।

इन अध्ययनों के अनुसार, सोशल मीडिया पर लोग अपनी ज़िंदगी का एक चुना हुआ और सुंदर हिस्सा दिखाते हैं, जिसे क्यूरेटेड जीवन (Curated Life) कहा जाता है। इस निरंतर तुलना  के कारण युवा अपनी वास्तविक ज़िंदगी को कमतर समझने लगते हैं।

Likes और views का मानसिक दबाव

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आज की युवा पीढ़ी के लिए Likes ,Comments और Views केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि आत्म-मूल्यांकन का पैमाना बन चुके हैं।
जब किसी पोस्ट पर अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो आत्मसम्मान (Self Worth) पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि यह स्थिति डोपामाइन की लत (Dopamine Addiction) को जन्म देती है, जिसमें युवा बार-बार फोन देखने के आदी हो जाते हैं, लेकिन भीतर की खालीपन की भावना दूर नहीं होती।

डिजिटल जुड़ाव, भावनात्मक दूरी

आज यह एक अजीब-सी सच्चाई बन गई है कि यह एक विडंबना है कि ऑनलाइन मित्रों (Online Friends) की संख्या बढ़ती जा रही है, लेकिन आमने-सामने बैठकर की जाने वाली बातचीत (Face-to-Face Interaction) कम होती जा रही है।

कैफे हों, हॉस्टल हों या घर — लोग साथ बैठकर भी अपने-अपने फोन में खोए रहते हैं। धीरे-धीरे यह आदत हमें एक-दूसरे से दूर कर देती है और बिना महसूस कराए अकेलेपन (Chronic Loneliness) में बदल सकती है। असली जुड़ाव स्क्रीन से नहीं, बल्कि सामने बैठकर की गई सच्ची बातचीत से पैदा होता है।

विशेषज्ञों की राय

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया अपने-आप में नकारात्मक नहीं है, लेकिन उसका अत्यधिक उपयोग (Excessive Use) समस्याएँ पैदा करता है।
युवाओं को डिजिटल सीमाएँ (Digital Boundaries) तय करनी चाहिए — जैसे स्क्रीन से दूर समय बिताना, वास्तविक शौक (Offline Hobbies) अपनाना और सच्चे रिश्तों को प्राथमिकता देना।

आगे का रास्ता

युवाओं के लिए यह समझना ज़रूरी है कि सोशल मीडिया एक साधन (Tool) है, जीवन का केंद्र नहीं। यह हमें लोगों से जोड़ता ज़रूर है, लेकिन कई बार हम अनजाने में अपनों से दूर हो जाते हैं
वास्तविक दुनिया के अनुभव — दोस्ती, संवाद, प्रकृति और रचनात्मकता — ही मानसिक संतुलन (Emotional Balance) प्रदान करते हैं। असली सुकून दोस्तों के साथ समय बिताने, दिल से बात करने, प्रकृति के बीच कुछ पल जीने और अपनी रचनात्मकता को खुलकर जीने में मिलता है। जब हम स्क्रीन से थोड़ा ब्रेक लेते हैं, तो खुद को बेहतर समझ पाते हैं, मन हल्का महसूस करता है और जीवन में संतुलन बना रहता है। यही संतुलन हमें सच में खुश और मजबूत बनाता है।

निष्कर्ष

सोशल मीडिया (social media) ने दुनिया को पास ज़रूर लाया है, लेकिन यदि इसका संतुलित उपयोग न किया जाए, तो यह भीड़ में भी इंसान को अकेला छोड़ सकता है।
असली सवाल यह नहीं है कि हम कितने जुड़े हुए हैं, बल्कि यह है कि क्या हम सच में खुश हैं? सच तो यही है कि खुशी स्क्रीन पर नहीं, बल्कि दिल से जुड़े रिश्तों में मिलती है।

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By Divyay

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