ASEAN SUMMIT, 23 अक्टूबर 2025 — कभी-कभी किसी “ग़ैरमौजूदगी” की खामोशी, हज़ार बयानों से ज़्यादा गूँजती है। इस बार भी कुछ वैसा ही हुआ — जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मलेशिया में होने वाले ASEAN समिट में न जाकर वर्चुअली शामिल होने का फैसला किया। पहली नज़र में यह बस एक साधारण “ऑनलाइन भागीदारी” लग सकती है, लेकिन दरअसल यह भारत की नई विदेश नीति की सोच का परिचय है — जहाँ तस्वीरों से ज़्यादा मायने रणनीति के हैं, और उपस्थिति से ज़्यादा असर निर्णय का होता है।
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Toggleक्यों नहीं गए मोदी मलेशिया?
Had a warm conversation with my dear friend, Prime Minister Anwar Ibrahim of Malaysia. Congratulated him on Malaysia’s ASEAN Chairmanship and conveyed best wishes for the success of upcoming Summits. Look forward to joining the ASEAN-India Summit virtually, and to further…
— Narendra Modi (@narendramodi) October 23, 2025
मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने खुद यह बात सार्वजनिक की — प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें सूचित किया कि वे इस बार ASEAN समिट में शारीरिक रूप से शामिल नहीं हो पाएंगे, क्योंकि यह समय भारत में दिवाली के बाद का व्यस्त और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण दौर है। अनवर इब्राहिम ने कहा —
“मैं प्रधानमंत्री मोदी के इस निर्णय का सम्मान करता हूँ। उन्होंने अपने देश की प्राथमिकताओं को सही मायने में वरीयता दी है।”
लेकिन सूत्रों और विशेषज्ञों का कहना है, यह निर्णय केवल त्योहार तक सीमित नहीं था। बीते कुछ हफ्तों में भारत की अमेरिका के साथ टैरिफ डील, रूस से ऊर्जा खरीद की नीति, और दक्षिण एशियाई सुरक्षा संवाद जैसे बड़े मसले सरकार की रणनीतिक प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का यह कदम एक साफ संदेश देता है — कि भारत के लिए अब “उपस्थिति” नहीं, बल्कि “परिणाम” ज़रूरी हैं।
#BREAKING: Malaysian PM Anwar Ibrahim says he received a phone call from Indian PM Narendra Modi last night informing him that he would attend the ASEAN Summit virtually. Says, he respects the decision and is looking forward to strengthen India-Malaysia and India-ASEAN ties. https://t.co/NHQpiB5B3E
— Aditya Raj Kaul (@AdityaRajKaul) October 23, 2025
अमेरिका और मुलाक़ात — जो रह गई अधूरी
ASEAN सम्मेलन को लेकर सबसे ज़्यादा चर्चित बात यह थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप की आमने-सामने मुलाक़ात संभव हो सकती है। दोनों देशों के बीच जारी टैरिफ वार्ता और व्यापारिक साझेदारी पर यह मुलाक़ात
एक अहम पड़ाव साबित हो सकती थी।लेकिन जब मोदी ने वर्चुअल रूप से शामिल होने का निर्णय लिया, तो यह संभावित मुलाक़ात अपने आप स्थगित हो गई। विपक्ष ने इस पर तुरंत निशाना साधा। कांग्रेस ने तंज कसते हुए कहा —
“प्रधानमंत्री मंच से दूर हैं, क्योंकि सवालों से बचना आसान है।”
वहीं विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसका बचाव किया —
“यह कोई ‘ग़ैरहाज़िरी’ नहीं, बल्कि एक पूर्व नियोजित प्रोटोकॉल है। भारत की भागीदारी अब स्थान से नहीं, सोच से तय होती है — हम हर मंच पर मौजूद हैं, चाहे वह स्क्रीन पर ही क्यों न हो।”
पर्दे के पीछे की कहानी: अब “पॉलिसी” पर ज़ोर, न कि “पब्लिसिटी” पर
राजनयिक हलकों में एक नया ट्रेंड साफ दिख रहा है — भारत अब अपनी विदेश नीति को “इवेंट डिप्लोमेसी” से आगे बढ़ाकर “पॉलिसी डिप्लोमेसी” में बदल रहा है। पहले जहाँ तस्वीरें, हैंडशेक्स और प्रेस कॉन्फ्रेंस किसी दौरे की सफलता तय करते थे, अब असली काम डिजिटल मीटिंग्स, बैक-चैनल वार्ताओं और साइलेंट स्ट्रैटेजी रूम्स में हो रहा है। एक वरिष्ठ राजनयिक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा —
“भारत अब वो देश नहीं रहा जो मंच पर जाकर तालियाँ बटोरता है, बल्कि वो खिलाड़ी बन चुका है जो मंच के बाहर बैठकर खेल की दिशा तय करता है।”
यह बदलाव सिर्फ तौर-तरीकों का नहीं, बल्कि सोच का है — जहाँ ‘इमेज बिल्डिंग’ से ज़्यादा ‘इम्पैक्ट बिल्डिंग’ को अहमियत दी जा रही है।
भारत को इससे क्या मिला — और क्या संकेत दिए
| पहलू | असर | संदेश |
|---|---|---|
| कूटनीति में नया तरीका | वर्चुअल भागीदारी से लचीलापन और निरंतर संवाद बनाए रखना | “भारत हर फोरम पर मौजूद है — चाहे स्क्रीन पर ही क्यों न हो।” |
| अंतरराष्ट्रीय संतुलन | अमेरिका, ASEAN और रूस के बीच संतुलित और ‘न्यूट्रल’ भूमिका | “भारत किसी ब्लॉक का हिस्सा नहीं, बल्कि अपनी दिशा का निर्माता है।” |
| घरेलू प्राथमिकताएँ | उत्सव, आर्थिक सत्र और नीति सुधारों को वरीयता | “राजनीति विदेश में नहीं, देश के भीतर से तय होती है।” |
विशेषज्ञों की राय — “यह चुप्पी एक संदेश है”
दिल्ली स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ के प्रोफेसर राघवन का मानना है —
“मोदी का ASEAN में न जाना कोई साधारण अनुपस्थिति नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और परिपक्वता का संकेत है। जब किसी राष्ट्र को अपनी स्थिति पर भरोसा होता है, तब उसे हर मंच पर जाकर हाथ मिलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।”
वहीं सिंगापुर स्थित नीति विश्लेषक एलेन चंद्रन ने कहा —
“भारत अब यह दिखाना चाहता है कि वह प्रतिक्रियाओं से नहीं, निर्णयों से पहचाना जाएगा।
यह वही दौर है जहाँ भारत सिर्फ चर्चा का हिस्सा नहीं, बल्कि दिशा तय करने वाला देश बन चुका है।”
विपक्ष और जनभावना — दो अलग दृष्टिकोण
कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री मोदी के इस निर्णय को “डिप्लोमैटिक डिस्टेंसिंग” करार दिया है। उनका तर्क है कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भौतिक उपस्थिति का न होना भारत की “सॉफ्ट इमेज” को कमजोर कर सकता है। वहीं दूसरी ओर, जनता और विशेषज्ञों का बड़ा वर्ग इस कदम को आधुनिक कूटनीति का संकेत मान रहा है। सोशल मीडिया पर इस विषय पर हजारों प्रतिक्रियाएँ आईं — कई लोगों ने लिखा,
“अगर मोदी ऑनलाइन हैं, तो देश भी समय से आगे है।”
यह बयान सिर्फ व्यंग्य नहीं, बल्कि एक वास्तविकता को दर्शाता है — भारत अब वैश्विक मंचों पर हाज़िरी से ज़्यादा मौजूदगी के प्रभाव को महत्व दे रहा है।
आगे की राह — “वर्चुअल मंच, असली प्रभाव”
अब असली सवाल यह नहीं कि मोदी मलेशिया गए या नहीं, बल्कि यह है कि भारत की आवाज़ कितनी दूर तक गूँजती है। वर्चुअल उपस्थिति का यह मॉडल एक संकेत है — भारत अब ASEAN जैसे मंचों को सिर्फ संवाद का स्थल नहीं, बल्कि डिजिटल नेतृत्व का केंद्र बनाना चाहता है। भविष्य की कूटनीति “मीटिंग रूम” में नहीं,
बल्कि स्क्रीन और रणनीति के मेल से तय होगी।
“आने वाले दशक में यात्राएँ कम होंगी, लेकिन भारत की नीति और प्रभाव की गति पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ होगी।”
निष्कर्ष — यह अनुपस्थिति एक उपस्थिति है
भारत की कूटनीति अब उस नए युग में प्रवेश कर चुकी है जहाँ पहले “उपस्थिति” ही कूटनीति मानी जाती थी, अब “रणनीति” ही उपस्थिति बन चुकी है।
“कभी दौरे तय करते थे रिश्ते, अब रिश्ते तय करते हैं दौरे।”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ASEAN समिट में ऑनलाइन हिस्सा लेना सिर्फ एक तकनीकी विकल्प नहीं, बल्कि एक राजनैतिक प्रतीक है — एक संकेत कि भारत अब भाग लेने वाला देश नहीं, बल्कि नीति तय करने वाला राष्ट्र बन रहा है। यह अनुपस्थिति दरअसल उपस्थिति से बड़ी उपस्थिति है — जहाँ मौन भी संदेश देता है, और स्क्रीन से भी नेतृत्व झलकता है।
